-पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे मजबूत और सबसे संवेदनशील कड़ी प्राथमिक शिक्षा है। यहीं से किसी भी बच्चे के बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास की नींव रखी जाती है। यदि यह आधार मजबूत हो, तो आगे की शिक्षा और जीवन की चुनौतियाँ अपेक्षाकृत सरल हो जाती हैं; यदि यह आधार कमजोर हो, तो बाद के सभी प्रयास सीमित परिणाम देते हैं। इसलिए सरकारी प्राथमिक शिक्षा की स्थिति केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। आज आवश्यकता है कि हम इस क्षेत्र में सुधार को प्राथमिकता दें और इसे राष्ट्रीय विकास के केंद्र में रखें।
सरकारी प्राथमिक विद्यालय देश के उन करोड़ों बच्चों की आशा हैं, जिनके परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं कि वे निजी शिक्षा का खर्च उठा सकें। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की पृष्ठभूमि विविध होती है—ग्रामीण क्षेत्र, शहरी झुग्गियाँ, मजदूर परिवार, छोटे किसान, दैनिक वेतनभोगी और वंचित समुदाय। इनके लिए स्कूल केवल पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन और अवसर का द्वार है। यदि यह द्वार कमजोर पड़ जाए, तो असमानता और गहरी हो जाती है।
सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि सरकारी प्राथमिक शिक्षा में सुधार की आवश्यकता वास्तविक और गंभीर है। कई विद्यालयों में आधारभूत संरचना की कमी, कक्षाओं की अपर्याप्त संख्या, शौचालय और पेयजल जैसी सुविधाओं का अभाव, या शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएँ अब भी मौजूद हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन से संभव है। जब तक प्रत्येक विद्यालय में न्यूनतम सुविधाएँ सुनिश्चित नहीं होंगी, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रहेगा।
शिक्षक किसी भी शिक्षा प्रणाली की आत्मा होते हैं। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक की भूमिका केवल पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं होती; वे बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में मार्गदर्शक और प्रेरक भी होते हैं। यदि शिक्षक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध न हों, या उन्हें नियमित प्रशिक्षण और प्रोत्साहन न मिले, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए सुधार का एक प्रमुख पहलू शिक्षक प्रशिक्षण, कार्य-परिस्थितियों में सुधार और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन होना चाहिए। शिक्षक को केवल प्रशासनिक कार्यों में उलझाने के बजाय उसे शिक्षण पर केंद्रित होने का अवसर देना आवश्यक है।
पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति पर भी गंभीर विचार की आवश्यकता है। प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य केवल रटने की क्षमता विकसित करना नहीं, बल्कि भाषा, गणित और बुनियादी समझ की ठोस नींव तैयार करना है। यदि बच्चा प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ना, लिखना और गणना करना ठीक से नहीं सीख पाता, तो आगे की शिक्षा उसके लिए कठिन हो जाती है। इसलिए सीखने के परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है। पाठ्यपुस्तकों को सरल, प्रासंगिक और स्थानीय संदर्भों से जुड़ा बनाना चाहिए, ताकि बच्चे अपने परिवेश से सीख को जोड़ सकें।
आज के समय में डिजिटल तकनीक भी प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा बन चुकी है। परंतु तकनीक को केवल प्रतीकात्मक रूप से नहीं, बल्कि उपयोगी और संतुलित तरीके से शामिल करना चाहिए। डिजिटल सामग्री, ऑडियो-विजुअल उपकरण और इंटरैक्टिव शिक्षण पद्धतियाँ सीखने को रोचक बना सकती हैं। किंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक साधन है। यदि तकनीक का उपयोग सुविचारित ढंग से किया जाए, तो वह शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ा सकती है।
सुधार का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है सामुदायिक भागीदारी। विद्यालय केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझा संपत्ति है। अभिभावकों, स्थानीय निकायों और समुदाय के प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी से विद्यालयों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है। जब अभिभावक नियमित रूप से स्कूल गतिविधियों में शामिल होते हैं और बच्चों की प्रगति पर ध्यान देते हैं, तो जवाबदेही बढ़ती है। यह सहभागिता शिक्षा को सामाजिक आंदोलन का रूप दे सकती है।
सरकारी प्राथमिक शिक्षा में सुधार का अर्थ केवल संसाधन बढ़ाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना भी है। यदि विद्यालयों की उपस्थिति, सीखने के परिणाम और वित्तीय उपयोग की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो, तो निगरानी और सुधार दोनों आसान हो सकते हैं। पारदर्शिता से विश्वास बढ़ता है, और विश्वास से सहयोग। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विश्वास की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
मिड-डे मील, छात्रवृत्ति और अन्य प्रोत्साहन योजनाएँ बच्चों को विद्यालय से जोड़ने में सहायक रही हैं। किंतु इन योजनाओं का उद्देश्य केवल उपस्थिति बढ़ाना नहीं, बल्कि सीखने की गुणवत्ता सुनिश्चित करना होना चाहिए। यदि बच्चा विद्यालय आता है पर सीख नहीं पाता, तो उपस्थिति का लाभ सीमित रह जाता है। इसलिए नीतियों का ध्यान सीखने की वास्तविक उपलब्धियों पर होना चाहिए।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। वहाँ विद्यालयों तक पहुँच, शिक्षकों की उपलब्धता और संसाधनों की निरंतरता जैसी चुनौतियाँ अधिक होती हैं। यदि इन क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा मजबूत नहीं होगी, तो क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है। सरकार को ऐसी रणनीतियाँ बनानी चाहिए जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान प्रस्तुत करें।
सरकारी प्राथमिक शिक्षा में सुधार का संबंध राष्ट्रीय विकास से सीधा जुड़ा है। एक शिक्षित पीढ़ी ही आर्थिक प्रगति, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मजबूती की आधारशिला बन सकती है। यदि प्राथमिक स्तर पर बच्चे मजबूत आधार के साथ आगे बढ़ते हैं, तो उच्च शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रम अधिक प्रभावी हो सकते हैं। इसके विपरीत, यदि प्रारंभिक शिक्षा कमजोर होगी, तो आगे के निवेश का लाभ सीमित हो जाएगा।
यह भी आवश्यक है कि शिक्षा को राजनीतिक बहस से ऊपर उठाकर दीर्घकालिक नीति के रूप में देखा जाए। प्राथमिक शिक्षा के सुधार के लिए निरंतरता और स्थिरता आवश्यक है। बार-बार नीतियों में परिवर्तन या अस्थायी योजनाएँ स्थायी परिणाम नहीं देतीं। शिक्षा सुधार एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसमें धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है।
अंततः, सरकारी प्राथमिक शिक्षा में सुधार केवल एक विभागीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। यह हमारे लोकतंत्र की मजबूती, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास से जुड़ा हुआ है। यदि हम चाहते हैं कि हर बच्चा अपने सपनों को साकार करने का अवसर पाए, तो हमें प्राथमिक शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। मजबूत आधार के बिना ऊँची इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। इसी प्रकार, मजबूत प्राथमिक शिक्षा के बिना विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा।
आज आवश्यकता है कि हम सुधार को केवल समस्या के रूप में न देखें, बल्कि अवसर के रूप में स्वीकार करें। सरकारी प्राथमिक शिक्षा में निवेश, सुधार और नवाचार भविष्य में कई गुना प्रतिफल दे सकते हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ से सशक्त, जागरूक और आत्मनिर्भर नागरिकों की पीढ़ी तैयार होगी। और यही वह मार्ग है जो भारत को समावेशी और स्थायी विकास की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।
संस्थापक-निदेशक अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन एवं न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन
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