Wednesday, February 25, 2026
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सावरकर का शक्ति और शास्त्र के संगम का अद्वितीय राष्ट्रवाद

-अशोक “प्रवृद्ध”
(26 फरवरी को सावरकर आत्मार्पण दिवस पर विशेष)विनायक दामोदर सावरकर (28 मई 1883- 26 फरवरी 1966) भारतीय इतिहास के उन विरल व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्हें जानना, समझना जितना जटिल है, उतना ही आवश्यक भी। राष्ट्र के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है। सावरकर केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, वरन एक भविष्यदृष्टा, तर्कशास्त्री, समाज सुधारक और प्रखर कवि भी थे। उनके राष्ट्र प्रेम का फलक इतना विस्तृत है कि वह जेल की कोठरी से लेकर आधुनिक सैनिकीकरण की नीतियों तक फैला हुआ है। वीर सावरकर एक निश्चित सांचे में ढलने वाले व्यक्तित्व नही थे। उनके राष्ट्र प्रेम का आधार कोई भावुकता मात्र नहीं, बल्कि एक कठोर बौद्धिक यथार्थवाद था। उनके जीवन के तीन प्रमुख आयाम उन्हें भारतीय चिंतन की मुख्यधारा में अद्वितीय स्थान दिलाते हैं। जहां उस दौर की मुख्यधारा की राजनीति याचिकाओं और क्रमिक सुधारों में विश्वास रखती थी, वहीं सावरकर ने सशस्त्र क्रांति और अजेय संकल्प के बल पर अभिनव भारत के माध्यम से पूर्ण स्वतंत्रता का शंखनाद किया। 1857 के संघर्ष को गद्दर के कलंक से निकालकर स्वतंत्रता समर का सम्मान दिलाना उनकी महानतम ऐतिहासिक देन थी। सेलुलर जेल की दीवारों पर कांटों से कविताएं लिखना और कोल्हू के बैल की तरह पिसते हुए भी हार न मानना, उनके उसी अजेय संकल्प का प्रमाण था, जिसे उन्होंने अपनी कविता में अनादि और अवध्य कहा था। सावरकर के राष्ट्र प्रेम का सबसे क्रांतिकारी पक्ष रुढियों पर प्रहार और उनके समाज सुधार के कार्य थे। वे जानते थे कि एक खंडित और छुआछूत में बंटा समाज कभी एक अखंड राष्ट्र नहीं बन सकता। रत्नागिरी में उन्होंने सप्त बंडियों अर्थात सात बेड़ियों को तोड़कर जो कार्य किया, वह उनके विज्ञानवादी होने का प्रमाण था। वैदिक, पौराणिक प्रसंग गोमहिमा से भरे होने के बावजूद भारतीय परंपरा के विपरीत उनका यह कहना कि गाय एक उपयोगी पशु है, भगवान नहीं, उनके तर्कसंगत राष्ट्रवाद को दर्शाता है। वे भारतीय समाज को प्राचीन रूढ़ियों से निकाल कर आधुनिक विज्ञान और औद्योगिक युग में ले जाना चाहते थे। सावरकर शायद पहले नेता थे, जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सैनिकीकरण की आवश्यकता को पहचाना। उनका नारा राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण केवल एक वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि भारत की सामरिक शक्ति को बढ़ाने का एक ब्लूप्रिंट था। उनका मानना था कि अहिंसा केवल तभी शोभा देती है जब आपके पास प्रहार करने की शक्ति हो। आज की आधुनिक रक्षा नीतियों में सावरकर के उसी शक्ति संतुलन के विचार की झलक मिलती है। सावरकर का राष्ट्र प्रेम स्व की पहचान का प्रेम था। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि उस पर रहने वाले लोगों का साहस, उनकी संस्कृति और उनकी वैज्ञानिक चेतना है। वे एक ऐसे शक्ति साधक थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति को यथार्थवाद का दर्पण दिखाया। मातृभूमि की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। यही सावरकर के जीवन का सार और संदेश है।

अंडमान की काल कोठरी में राष्ट्रवाद का व्याकरण लिखने वाले वीर सावरकर का राष्ट्रवाद केवल नारों का नहीं, बल्कि निशान और निर्माण का राष्ट्रवाद था। उन्होंने हमें सिखाया कि जब तक समाज जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा, तब तक अखंड भारत का स्वप्न अधूरा रहेगा। उन्होंने नारा दिया- हिन्दुओं का सैनिकीकरण करो, क्योंकि वे जानते थे कि कायरों की शांति को दुनिया कायरता कहती है, जबकि शक्तिशालियों की शांति को दुनिया सम्मान देती है। उनके विज्ञाननिष्ठ और सशक्त भारत के विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणा देने वाले हैं। सावरकर राष्ट्रवाद, क्रांति व तर्क के संगम थे। सावरकर का राष्ट्रवाद भी अद्वितीय है, क्योंकि वह अतीत के गौरव और भविष्य की आधुनिकता को जोड़ता है। जहां एक ओर वे हिन्दू पद पादशाही के माध्यम से इतिहास को पुनर्जीवित करते हैं, वहीं दूसरी ओर वे अष्टाक्षरी लिपि में सुधार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की वकालत करते हैं। उनका राष्ट्रवाद केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हिन्दू समाज के भीतर की बुराइयों को समाप्त कर उसे वैश्विक शक्ति बनाने का एक व्यापक दर्शन था। उनके विचार आज की आत्मनिर्भर भारत और मजबूत रक्षा नीति की नींव में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। सावरकर के सैनिकीकरण के विचार केवल कागजी नहीं थे। ऐतिहासिक विवरणियों के अनुसार 22 जून 1940 को सुभाष चंद्र बोस ने सावरकर से उनके मुंबई स्थित निवास सावरकर सदन में मुलाकात की थी। सावरकर ने ही बोस को सलाह दी थी कि वे देश छोड़कर बाहर जाएं और द्वितीय विश्व युद्ध में बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को संगठित कर एक बाहरी सेना (आजाद हिन्द फौज) तैयार करें। यह सावरकर की दूरदर्शिता ही थी कि जब आजाद हिन्द फौज ने भारत की सीमा पर दस्तक दी, तो ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई। सावरकर का राष्ट्र प्रेम केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, वे हिन्दी और मराठी भाषा को विदेशी शब्दों के प्रभाव से मुक्त करना चाहते थे। आज हिन्दी की मुख्यधारा में वृहत रूप में प्रयुक्त होने वाले शब्द – दिग्दर्शक, नगरपालिका, महापौर, प्राचार्य आदि शब्द प्रयोग सावरकर की ही देन हैं। उन्होंने भाषा को राष्ट्र की आत्मा माना और इसके शुद्धिकरण के लिए व्यापक शब्दकोश तैयार किया। सावरकर की काला पानी की जेल यात्रा केवल शारीरिक कष्ट की कहानी नहीं है, बल्कि वह मानवीय इच्छाशक्ति की पराकाष्ठा है। सेलुलर जेल में जब उन्हें कागज नहीं दिया गया, तो उन्होंने पत्थर के टुकड़ों और कीलों से जेल की दीवारों पर 6000 से अधिक पंक्तियां लिखीं। उन्होंने उन पंक्तियों को कंठस्थ किया और जब वे रिहा हुए, तो उन्होंने उन्हें पुनः कागजों पर उतारा। यह विश्व साहित्य के इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहां एक बंदी ने अपनी स्मृतियों में पूरी किताब संजो कर रखी थी। सावरकर ने कहा था, धर्मग्रंथों को अलमारी में बंद कर दो और विज्ञान की प्रयोगशालाओं को खोलो। उन्होंने परमाणु शक्ति और आधुनिक तकनीक का समर्थन किया। उनका मानना था कि राष्ट्र की रक्षा केवल पूजा-पाठ से नहीं, बल्कि आधुनिक हथियारों और वैज्ञानिक सोच से होगी। उन्होंने हिन्दुत्व को एक गतिशील पहचान माना, जो समय के साथ बदलने की क्षमता रखती है।

वीर सावरकर को किसी एक विचारधारा की सीमा में बांधना कठिन है। वे एक ऐसे क्रांतिकारी तर्कशास्त्री थे, जिन्होंने यह सिखाया कि राष्ट्र भक्ति का अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं, बल्कि समाज की कुरीतियों को जलाना और राष्ट्र को सैन्य व वैज्ञानिक रूप से इतना सक्षम बनाना है कि दुनिया उसकी ओर आंख उठाकर न देख सके। उनका जीवन एक जलती हुई मशाल की तरह था, जिसने न केवल स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि स्वतंत्र भारत को सुरक्षित रखने का मंत्र भी दिया। विनायक दामोदर सावरकर का राष्ट्र प्रेम उनके जीवन के हर पहलू क्रांतिकारी गतिविधियों, वैचारिक लेखन और सामाजिक सुधारों में झलकता है। उनके लिए राष्ट्र केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत थी। उन्होंने मित्र मेला और अभिनव भारत जैसी गुप्त संस्थाएं बनाईं ताकि युवाओं को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रेरित किया जा सके। अपनी मातृभूमि के लिए उन्होंने सेलुलर जेल (काला पानी) में वर्षों तक अमानवीय यातनाएं सहीं। सावरकर ने हिन्दुत्व को एक व्यापक राष्ट्रीय पहचान के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार जो भी भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह इस राष्ट्र का अटूट हिस्सा है। उन्होंने हिन्दू पद पादशाही जैसे ग्रंथों के माध्यम से भारतीय गौरव को पुनर्जीवित किया। वे विभाजन के घोर विरोधी थे और अखंड भारत की परिकल्पना में विश्वास रखते थे, जहां सिंधु नदी से समुद्र तक की भूमि एक सूत्र में पिरोई हो। उनके राष्ट्र प्रेम में केवल स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि एक मजबूत और संगठित समाज भी शामिल था। उन्होंने रत्नागिरि में नजरबंदी के दौरान जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया ताकि राष्ट्र आंतरिक रूप से शक्तिशाली बने। उन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर पुस्तक लिखकर अंग्रेजों के उस विमर्श को चुनौती दी, जिसमें इसे केवल एक सैन्य विद्रोह कहा गया था। इस कृति ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को भी राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित किया। सावरकर का मानना था कि राष्ट्र की रक्षा के लिए शास्त्र के साथ शस्त्र का ज्ञान भी आवश्यक है, इसीलिए उन्होंने राजनीति के हिन्दूकर और हिन्दुओं के सैनिकीकरण का नारा दिया। कहा जाता है कि उनके इन्हीं क्रन्तिकारी विचारों और अदम्य साहस के कारण वीर की उपाधि उन्हें जनता ने दी थी। कुछ विवरणियों के अनुसार प्रहलाद केशव अत्रे ने उन्हें एक सार्वजनिक सभा में इस उपाधि से संबोधित किया था, जिसके बाद वे वीर सावरकर के नाम से विख्यात हुए। सावरकर का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा रहा है- एक तरफ वे एक क्रांतिकारी थे, तो दूसरी तरफ एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक। ऐसे महान क्रांतिकारी सावरकर का अंत भी उनके जीवन की तरह ही गरिमापूर्ण था। उन्होंने आत्मार्पण अर्थात स्वेच्छा से देह त्याग का मार्ग चुना। 1 फ़रवरी 1966 को सावरकर ने घोषणा की कि उनका जीवन उद्देश्य पूर्ण हो चुका है और अब वे भोजन, जल और दवाओं का त्याग अर्थात प्रायोपवेशन कर रहे हैं। उन्होंने इसे आत्महत्या नहीं, बल्कि आत्मार्पण कहा, क्योंकि यह निराशा में नहीं वरन कर्तव्य पूर्ति के बोध के साथ लिया गया निर्णय था। उन्होंने अपने लेख आत्महत्या की आत्मार्पण में तर्क दिया कि जब शरीर काम करना बंद कर दे और राष्ट्र के लिए व्यक्ति की उपयोगिता समाप्त हो जाए, तो मृत्यु की प्रतीक्षा करने के बजाय उसे गरिमा के साथ गले लगाना श्रेष्ठ है। लगभग 26 दिनों के उपवास के बाद 26 फ़रवरी 1966 को सुबह 11:10 बजे उन्होंने मुंबई के सावरकर सदन में अंतिम सांस ली।

लेखक, अध्यात्मिक चिन्तक व साहित्यकार

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