Saturday, January 17, 2026
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चीन यात्रा के मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में जिस प्रकार से रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया गया है, यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बीजिंग अब भारत से संबंधों को सुधारने और आगे बढ़ाने को लेकर काफी उत्सुक है। हालांकि यह उत्सुकता केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक दबावों का परिणाम भी है। यह बात सर्वविदित है कि भारत और चीन के रिश्तों का इतिहास जटिल और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। कभी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा गूंजा तो कभी 1962 का युद्ध और उसके बाद लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सीमा विवाद ने इन रिश्तों को कड़वाहट से भर दिया। आज भी गलवान घाटी की यादें ताजा हैं, जहां सैनिकों की झड़पों ने दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई गहरी कर दी। फिर भी, राजनीति की दुनिया में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते। हितों और परिस्थितियों के आधार पर समीकरण बदलते रहते हैं। यही कारण है कि सात साल से अधिक के अंतराल के बाद मोदी की यह चीन यात्रा केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में एक अहम कदम है। इसलिए देखा जाए तो यह दौरा कई मायने में महत्वपूर्ण है,क्योंकि मोदी ऐसे समय में चीन पहुंचे हैं, जब भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ विवाद के कारण असहजता बढ़ी हुई है। अमेरिका ने एक तरह से भारत के खिलाफ टैरिफ वॉर छेड़ दिया है। इस पृष्ठभूमि में चीन यात्रा केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक भू-राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य से भी जुड़ा हुआ है। पिछले कुछ समय से अमेरिका ने भारत के उत्पादों पर बढ़े हुए टैरिफ लगाए हैं। इसका असर भारतीय निर्यात पर पड़ रहा है और व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ा है। अमेरिका लंबे समय से भारत को अपने आर्थिक और सामरिक साझेदार के रूप में देखता रहा है, लेकिन ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और संरक्षणवादी रुझानों ने इस रिश्ते को झकझोर दिया है। ऐसे माहौल में भारत के लिए जरूरी है कि वह अपने व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों को विविध बनाए। चीन यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। यह संदेश देने का प्रयास है कि भारत केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है, बल्कि बहुध्रुवीय कूटनीति अपनाकर अपने हितों की रक्षा कर सकता है। दरअसल मोदी मुख्य रुप से शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 31 अगस्त और एक सितंबर को आयोजित होने वाले वार्षिक शिखर सम्मलेन में हिस्सा लेने के लिए चीन पहुंचे हुए हैं। इस बार समिट को लेकर दुनिया की नजरें खासतौर पर मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर हैं, क्योंकि सात साल बाद दोनों नेताओं की आमने-सामने बातचीत होगी। माना जा रहा है कि बातचीत में भारत-चीन रिश्तों की समीक्षा होगी और व्यापार व सीमा विवाद पर आगे की स्थिति पर चर्चा होगी। पिछले साल रूस के कजान में ब्रिक्स समिट के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी, जहां सीमा पर पेट्रोलिंग को लेकर एक समझौता हुआ था। माना जा रहा है कि इस बैठक में ट्रंप के टैरिफ का तोड़ निकालने पर चर्चा होगी। चूंकि वॉशिंगटन द्वारा लगाए गए टैरिफ विवाद ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा की है, ऐसे में मोदी-शी मुलाकात को अमेरिका और यूरोप भी बारीकी से देख रहे हैं। नि:संदेह दोनों ही देशों की कोशिश टैरिफ नीति से उपजे वैश्विक तनाव के बीच रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश होगी। बातचीत में आर्थिक सहयोग और पूर्वी लद्दाख सीमा विवाद के बाद बिगड़े हालात पर चर्चा होने की संभावना है। इसलिए माना जा रहा है कि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बीच भारत और चीन के बीच आर्थिक साझेदारी नई दिशा ले सकती है। भारत चीनी निवेश आकर्षित करना चाहता है, जबकि चीन अपने सामान के लिए बड़ा बाजार ढूंढ रहा है। भारत और चीन यदि आपसी सहयोग का रास्ता चुनते हैं, तो पूरे एशिया में स्थिरता का संदेश जाएगा। नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों पर इसका सकारात्मक असर हो सकता है। एससीओ समिट के दौरान उनकी मुलाकात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य नेताओं से भी हो सकती है। पुतिन से मुलाकात के दौरान रूस से भारत की तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव और टैरिफ को लेकर चर्चा होने की उक्वमीद जताई जा रही है। इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आए थे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल व विदेश मंत्री एस जयशंकर से बातचीत के बाद दोनों देशों ने सीमा पर शांति और सहयोग बढ़ाने के लिए कदम उठाने की घोषणा की थी। इसलिए यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। इस यात्रा का उद्देश्य ना केवल रिश्तों को फिर से सक्रिय करना, बल्कि सीमा विवाद का समुचित समाधन की ओर अग्रसर होना भी है। एससीओ शिखर सक्वमेलन में दुनिया के करीब 20 नेता शामिल होंगे। यह ग्लोबल साउथ एकजुटता को दिखाने का एक प्रभावशाली अवसर भी होगा। प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन शिखर सक्वमेलन से इतर कुछ द्विपक्षीय बैठकें भी कर सकते हैं। इसलिए मोदी की यह चीन यात्रा केवल दो देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात भर नहीं है। यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में एशिया की राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने वाली घटना है। भारत और चीन यदि अपने मतभेदों को पीछे छोडक़र सहयोग की राह पर बढ़ते हैं, तो न केवल दोनों देशों को बल्कि पूरे एशिया को लाभ होगा। फिर भी, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास का बोझ, सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां आसानी से खत्म नहीं होतीं। इसीलिए इस यात्रा को हमें न तो अति-आशावाद के चश्मे से देखना चाहिए और न ही निराशावाद के। इसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए, ऐसा अवसर जो भारत और चीन दोनों को यह सोचने पर मजबूर करे कि टकराव से बेहतर है सहयोग। आज जब दुनिया आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है, तब एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों का आपसी सहयोग पूरे विश्व के लिए आशा की किरण बन सकता है। यदि इस यात्रा से सीमा विवादों में शांति, व्यापारिक सहयोग और रणनीतिक संवाद की नई राहें खुलती हैं, तो यह भारत-चीन संबंधों के नए युग की शुरुआत होगी। साथ ही, यह ग्लोबल साउथ को एकजुट कर पश्चिमी दबावों के खिलाफ सामूहिक शक्ति दिखाने का भी सशक्त अवसर साबित हो सकता है।

 

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