Monday, February 23, 2026
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बांग्लादेश से कम होती कड़वाहट

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते उपमहाद्वीप की राजनीति, इतिहास और भूगोल की ऐसी धुरी पर टिके हैं, जिसे न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही लंबे समय तक तनाव में रखा जा सकता है। इसके कई कारण है, जिसमें दोनों देशों की साझा इतिहास, सांस्कृतिक निकटता, भाषाई समानता और 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत शामिल है। इन सबने दोनों देशों को केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि साझी नियति वाले राष्ट्रों के रूप में स्थापित किया है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इन रिश्तों में आई कड़वाहट ने यह सवाल खड़ा कर दिया था कि क्या यह ऐतिहासिक मित्रता राजनीतिक उतार-चढ़ाव की भेंट चढ़ जाएगी? अंतरिम सरकार के दौर में भारत-बांग्लादेश संबंधों में जो तनाव पैदा हुआ, उसने दोनों देशों के बीच भरोसे की नींव को कमजोर किया था। भारत विरोधी प्रदर्शनों, कूटनीतिक बयानबाजी और वीजा सेवाओं के निलंबन जैसे कदमों ने संकेत दिया कि रिश्ते एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। दिसंबर में कांसुलर और वीजा सेवाओं को रोकना इसी तनाव की परिणति थी। शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद उपजे विरोध प्रदर्शनों और अल्पसंक्चयक हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरों ने भारत में गंभीर चिंता पैदा की। स्वाभाविक था कि नई दिल्ली ने अपनी नाराजगी कूटनीतिक स्तर पर दर्ज कराई। ऐसे माहौल में तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार का गठन कई आशंकाओं के साथ हुआ। रहमान, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं, और उनके कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी देखी गई थी। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा, या फिर नई सरकार एक अलग राह चुनेगी? अब तक के संकेत बताते हैं कि ढाका ने व्यावहारिक कूटनीति को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। दिल्ली स्थित बांग्लादेश हाई कमीशन द्वारा भारतीय नागरिकों के लिए पूर्ण वीजा सेवाओं की बहाली इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय रहमान के शपथ ग्रहण के तीन दिन बाद आया, जो समय की दृष्टि से भी यह संदेश स्पष्ट है कि नई सरकार संबंध सुधार को प्राथमिकता दे रही है। वीजा सेवाओं की बहाली केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत है। मेडिकल, टूरिस्ट और अन्य श्रेणियों की सेवाओं का फिर से शुरू होना यह दर्शाता है कि दोनों देश जन-स्तर के संपर्क को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। दूसरी ओर, भारत की ओर से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम के तुरंत बाद तारिक रहमान को बधाई संदेश भेजा और फोन पर बातचीत की। शपथ ग्रहण समारोह में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की उपस्थिति और प्रधानमंत्री का व्यक्तिगत पत्र ये सभी कदम उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद की पुनर्बहाली के प्रतीक हैं। यह कूटनीतिक भाषा में स्पष्ट संदेश है कि नई दिल्ली अतीत की कटुता को पीछे छोडक़र आगे बढ़ने को तैयार है। विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी का व्यक्तिगत पत्र, जिसमें उन्होंने रहमान और उनके परिवार को भारत आने का निमंत्रण दिया, प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विश्वास बहाली का प्रयास है। भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा और बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान के बीच हुई मुलाकात ने भी यह स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष रिश्तों को ‘सकारात्मक, रचनात्मक और आगे की सोच वाले नजरिए’ से आगे बढ़ाना चाहते हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ओर से दिल्ली आने का न्योता इसी दिशा में अगला कदम है। कूटनीति में प्रतीकों की अपनी भाषा होती है और इस समय दोनों ओर से जो संकेत मिल रहे हैं, वे संवाद और सहयोग के पक्ष में हैं। हालांकि, केवल संदेशों और बैठकों से रिश्तों की मरक्वमत पूरी नहीं होती। पिछले दौर में आई गिरावट के कारणों को भी समझना होगा। यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भारत ने अल्पसंक्चयक हिंदू समुदायों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। दूसरी ओर, बांग्लादेश के भीतर भारत की भूमिका को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई थी। मीडिया में भी आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चला। इन सबने विश्वास की नींव को कमजोर किया। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच संतुलन कैसे साधती है। बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में भारत का मुद्दा अक्सर संवेदनशील रहा है। किसी भी सरकार के लिए यह जरूरी होता है कि वह राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे, लेकिन साथ ही पड़ोसी के साथ व्यावहारिक संबंध भी बनाए रखे। तारिक रहमान यदि दीर्घकालिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति चाहते हैं, तो भारत के साथ सहयोग उनके लिए रणनीतिक रूप से लाभकारी होगा। भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक और विकासात्मक प्राथमिकताओं में मजबूत तालमेल है। कनेक्टिविटी परियोजनाएं, सीमा पार व्यापार, ऊर्जा सहयोग, नदी जल प्रबंधन, कौशल विकास और शिक्षा ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां दोनों देशों को पारस्परिक लाभ मिल सकता है। पूर्वोत्तर भारत के लिए बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति रणनीतिक महत्व रखती है, जबकि बांग्लादेश के लिए भारत एक बड़ा बाजार और निवेश स्रोत है। ऐसे में तनाव दोनों के लिए हानिकारक साबित होता है। जन-समुदाय के स्तर पर भी रिश्ते गहरे हैं। साझा इतिहास, भाषा और संस्कृति दोनों देशों को जोड़ते हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम की स्मृतियां आज भी भारत-बांग्लादेश संबंधों की आधारशिला हैं। लेकिन इतिहास केवल गौरव का विषय नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। दोनों देशों को यह समझना होगा कि अतीत की दोस्ती को वर्तमान की नीतियों से मजबूत करना ही भविष्य की स्थिरता की गारंटी है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए व्यक्तिगत निमंत्रण और उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व ने यह स्पष्ट किया है कि नई दिल्ली ढाका के नए नेतृत्व के साथ काम करने को तैयार है। अब गेंद बांग्लादेश के पाले में भी है। यदि नई सरकार अपने शुरुआती संकेतों को ठोस नीतिगत फैसलों में बदलती है, जैसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, भारत विरोधी तत्वों पर अंकुश लगाना और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देना तो संबंधों में वास्तविक सुधार संभव है। कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यह पहल बिगड़े रिश्तों को सुधारने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। लेकिन अंतत: संबंधों की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि सद्भावना कितनी जल्दी ठोस परिणामों में बदलती है। क्या व्यापार बढ़ेगा? क्या सीमा प्रबंधन में सहयोग मजबूत होगा? क्या सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को नई गति मिलेगी? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले महीनों में स्पष्ट होंगे। फिलहाल, संकेत सकारात्मक हैं। वीजा सेवाओं की बहाली, उच्चस्तरीय संवाद और व्यक्तिगत निमंत्रण ये सभी कदम नई शुरुआत की ओर इशारा करते हैं। उपमहाद्वीप की स्थिरता और समृद्धि के लिए भारत और बांग्लादेश का सहयोग अनिवार्य है। नई दिल्ली से संदेश स्पष्ट है कि भारत बांग्लादेश के साथ एक नई शुरुआत के लिए तैयार है। अब परीक्षा इस बात की है कि क्या दोनों सरकारें इस सकारात्मक संकेत को ठोस और दीर्घकालिक साझेदारी में बदल पाती हैं या नहीं। समय ही इसका उत्तर देगा, लेकिन फिलहाल उमीद की किरण दिखाई दे रही है।

 

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