Wednesday, February 25, 2026
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बांग्लादेश में मुकदमों की नई जांच से क्या बदलेगी शेख हसीना की किस्मत?

– महेन्द्र तिवारी
बांग्लादेश की राजनीति में 23 फरवरी 2026 को गृहमंत्री सलाहुद्दीन अहमद द्वारा मुकदमों की पुनः जांच का आदेश देना एक ऐसा मोड़ है, जिसके गहरे निहितार्थ हैं। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के पतन के बाद देश जिस उथल-पुथल से गुजरा, उसने न केवल सत्ता का केंद्र बदला, बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं को भी राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से घेर दिया। अब जब नई निर्वाचित बांग्लादेश नेशनालिस्ट पार्टी सरकार ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में इन मामलों की समीक्षा करने का निर्णय लिया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे शेख हसीना को कोई राहत मिल सकती है। इस विषय का विश्लेषण करने के लिए हमें कानूनी बारीकियों, राजनीतिक नैरेटिव और अंतरराष्ट्रीय दबाव के त्रिकोण को समझना होगा।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस समीक्षा का दायरा क्या है। गृहमंत्री ने स्पष्ट किया है कि जांच केवल उन मुकदमों की होगी जो 5 अगस्त 2024 के बाद दर्ज किए गए। हसीना सरकार के गिरने के बाद उपजी अराजकता में कई अवामी लीग कार्यकर्ताओं, व्यवसायियों और पत्रकारों पर ऐसे मुकदमे दर्ज हुए, जिनके बारे में माना जाता है कि वे व्यक्तिगत रंजिश या “भीड़ तंत्र” के दबाव में किए गए थे। कानूनी रूप से, यह समीक्षा शेख हसीना के लिए सीधे तौर पर कोई ढाल नहीं बनती। इसका कारण यह है कि हसीना पर लगे मुख्य आरोप जैसे 2024 के छात्र आंदोलन का दमन और मानवता के खिलाफ अपराध 5 अगस्त से पहले की घटनाओं से जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा उन्हें दी गई मौत की सजा और भ्रष्टाचार के मामलों में मिली 10 साल की कैद इसी श्रेणी में आती है। अतः, पोस्ट-अगस्त मुकदमों की फाइलें दोबारा खुलने से उनकी सजाओं पर कोई तत्काल कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।
हालांकि, कानून केवल धाराओं से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और प्रक्रियाओं की शुचिता से चलता है। यदि समीक्षा में यह पाया जाता है कि 5 अगस्त के बाद अवामी लीग के हजारों समर्थकों पर फर्जी केस लादे गए थे, तो यह शेख हसीना के वकीलों को एक मजबूत ‘प्रक्रियागत तर्क’ प्रदान करेगा। वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा कर सकेंगे कि जब निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामले राजनीतिक द्वेष से प्रेरित हो सकते हैं, तो सर्वोच्च नेता के खिलाफ की गई पूरी न्यायिक प्रक्रिया भी निष्पक्ष नहीं हो सकती। यह स्थिति शेख हसीना को एक “पीड़ित” के रूप में चित्रित करने में मदद करेगी, जिससे उन्हें प्रत्यक्ष कानूनी लाभ न सही, पर एक नैतिक और नैरेटिव आधारित लाभ अवश्य मिल सकता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो तारिक रहमान की सरकार एक कठिन संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। एक तरफ उन्हें उन छात्रों और जनता को संतुष्ट करना है जिन्होंने हसीना के खिलाफ क्रांति की, और दूसरी तरफ उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह दिखाना है कि बांग्लादेश अब “प्रतिशोध की राजनीति” से आगे बढ़ चुका है। यदि समीक्षा के दौरान बड़ी संख्या में मुकदमे वापस लिए जाते हैं, तो अवामी लीग के वे कार्यकर्ता जो अब तक भूमिगत थे या डरे हुए थे, फिर से सक्रिय हो सकते हैं। कार्यकर्ताओं की यह सक्रियता शेख हसीना के लिए एक संजीवनी की तरह होगी, क्योंकि किसी भी निर्वासित नेता की शक्ति उसकी जमीन पर मौजूद फौज से ही तय होती है। इससे हसीना को यह कहने का मौका मिलेगा कि उनकी पार्टी के खिलाफ जो भी हुआ वह एक “अवैध तख्तापलट” का हिस्सा था।
एक और महत्वपूर्ण आयाम अंतरराष्ट्रीय संबंधों का है। शेख हसीना वर्तमान में भारत में निर्वासन में हैं और ढाका की नई सरकार उनके प्रत्यर्पण के लिए दबाव बना रही है। मुकदमों की पुनः जांच का आदेश कहीं न कहीं यह संकेत देता है कि बीएनपी सरकार कानून के शासन को बहाल करना चाहती है। यदि जांच निष्पक्ष होती है, तो यह नई सरकार की साख बढ़ाएगी, लेकिन यदि इसमें अवामी लीग के प्रति “नरमी” के संकेत मिले, तो भारत जैसे पड़ोसी देशों को हसीना के पक्ष में खड़े होने का और अधिक आधार मिल जाएगा। भारत पहले ही इन मुकदमों को बांग्लादेश का आंतरिक मामला बताते हुए मानवीय आधार पर हसीना को शरण दिए हुए है। यदि ढाका खुद स्वीकार करता है कि उसके यहाँ दर्ज मुकदमों में विसंगतियां हैं, तो प्रत्यर्पण की मांग कानूनी रूप से कमजोर पड़ सकती है।
सामाजिक रूप से, बांग्लादेश इस समय बुरी तरह ध्रुवीकृत है। 5 अगस्त के बाद अल्पसंख्यकों और अवामी लीग से जुड़े लोगों के खिलाफ हुई हिंसा ने एक घाव छोड़ दिया है। गृहमंत्री का यह कहना कि “निर्दोषों को परेशान नहीं किया जाएगा,” उस वर्ग में सुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है जो हसीना का समर्थक रहा है। यह सामाजिक स्थिरता की ओर एक कदम हो सकता है, लेकिन हसीना के लिए यह परोक्ष फायदा है क्योंकि इससे उनके समर्थन आधार का बिखराव रुक जाएगा। जब समर्थक सुरक्षित महसूस करेंगे, तभी वे हसीना की वापसी या उनके विचारों के लिए आवाज उठा पाएंगे।
अंततः, इस पूरी कवायद से शेख हसीना को मिलने वाला लाभ “सीमित और परोक्ष” प्रतीत होता है। उन्हें जेल से बाहर निकालने या उनकी सजा कम करने का कोई सीधा रास्ता इस समीक्षा से नहीं निकलता। लेकिन, यह कदम उस कठोर कानूनी और राजनीतिक घेराबंदी को थोड़ा ढीला जरूर कर सकता है जो 5 अगस्त के तुरंत बाद उनके चारों ओर बनाई गई थी। यदि बीएनपी सरकार इस जांच को पारदर्शी तरीके से पूरा करती है, तो यह बांग्लादेश के लोकतंत्र की जीत होगी, लेकिन यदि इसमें जरा भी चूक हुई, तो शेख हसीना इसे अपनी वापसी का पहला पायदान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। निष्कर्षतः, यह कदम हसीना की सजा को तो नहीं बदल सकता, लेकिन उनकी धूमिल होती छवि को “राजनीतिक शिकार” के रूप में पुनर्जीवित करने का अवसर अवश्य प्रदान कर सकता है।

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